- 2017 में नजूल अधिकारी धरमजयगढ़ ने खारिज किया था नामांतरण, 2023 में दूसरे अधिकारी ने किया पास
रायगढ़,। आदिवासी व्यक्ति की जमीनों को कोई गैर आदिवासी बिना कलेक्टर की अनुमति के नहीं खरीद सकता। केवल कलेक्टर ही इसके लिए सक्षम होते हैं, लेकिन धरमजयगढ़ में कमाल हो गया है। एक आदिवासी जमीन की रजिस्ट्री के बाद नामांतरण आवेदन खारिज कर दिया गया। छह साल बाद दूसरे अधिकारी ने इसे पारित कर दिया। कलेक्टर ने इसकी जांच के आदेश दिए हैं। धरमजयगढ़ अनुविभाग में जमीनों की हेराफेरी बहुत बड़े पैमाने पर हुई है। आदिवासी और सरकारी जमीन की बंदरबांट करने वाले जमीन दलालों की ताकत बहुत ज्यादा हो चुकी है।
अब यही दलाल तय करते हैं कि कौन सा अधिकारी यहां रहेगा या नहीं। कोई अफसर उनके हिसाब से नहीं चलता तो उसको फंसाने के लिए षडयंत्र होते हैं। एक मामला आदिवासी जमीन की खरीदी-बिक्री का है। इसमें प्रशासनिक अधिकारी ने जो खेल किया वह समझ से परे है। कुमुद मंडल पिता भवानी मंडल और कौशिक मंडल पिता भवानी मंडल शाहपुर ने धरमजयगढ़ नजूल टाउन की भूमि प्लॉट नंबर 845/8 रकबा 2871 वर्गफुट को 23 जून 2017 को रजिस्ट्री करवाई। यह भूमि अभिषेक कुजूर पिता उत्तमदाप कुजूर जाति उरांव निवासी धरमजयगढ़ की थी। ट्राइबल क्षेत्र होने की वजह से आदिवासी से गैर आदिवासी भूमि अंतरण के पहले कलेक्टर की
अनुमति जरूरी थी। लेकिन इसके बिना ही साढ़े छह लाख में जमीन खरीद ली गई। न्यायालय नजूल अधिकारी के समक्ष नामांतरण के लिए आवेदन लगाया गया था। नजूल अधिकारी धरमजयगढ़ ने छग भू राजस्व संहिता 1959 की धारा 165-6 (क) का उल्लंघन पाया और आवेदन खारिज कर दिया। बिना जिला कलेक्टर की अनुमति के अनुसूचित जनजाति की जमीन कोई गैर आदिवासी क्रय नहीं कर सकता। 20 अगस्त 2018 को हुए आदेश के बाद कुमुद और कौशिक ने फिर से जमीन को हासिल करने के लिए 2023 में आवेदन किया। इस बार नजूल अधिकारी बदल चुके थे।
कब होगी कार्रवाई
कलेक्टर ने इस मामले में जांच के आदेश दिए हैं। यह प्रकरण राजस्व न्यायालयों में बैठे अधिकारियों के अल्पज्ञान को भी दर्शाता है। किसी न्यायालय में कोई प्रकरण खारिज होता है, उससे ऊपर के राजस्व न्यायालय में अपील करनी पड़ती है। लेकिन इस मामले में कुमुद और कौशिक ने पुन: 2023 में नजूल अधिकारी धरमजयगढ़ के समक्ष आवेदन किया। इस बार अधिकारी ने धारा 165-6 (क) लागू नहीं होने का कारण बताते हुए नामांतरण आदेश पारित कर दिया। प्रकरण खारिज होने के बाद ऊपर के न्यायालय में अपील की जानी थी। अब जांच के बाद साफ होगा कि गलती किसने की। इसके बाद वैधानिक कार्रवाई क्या होगी, यह सवाल है।




